तुझमे राम मुझमे राम रोमरोम में राम रे l
राम को भज ले ध्यान तू करले छोड़ जगत के काम रे
एक सब्ज़ी वाला,सब्ज़ी की पूरी दुकानसाइकिल पर लगा कर घूमता था.l “प्रभु” उसका तकिया कलाम था.
कोई पूछता ~ आलू कैसे दिये ?
वो जवाब देता ~ 10 रुपये , प्रभु
हरी धनिया है क्या ?
बिलकुल ताज़ा है , प्रभु
वह सबको प्रभु कहता था.
लोग भी उसको
प्रभु कहकर पुकारने लगे.
एक दिन उससे किसी ने पूछा ~
तुम सबको प्रभु-प्रभु क्यों कहते हो ?
यहाँ तक कि … तुझे भी लोग
इसी नाम से बुलाते हैं.
तुम्हारा कोई असली नाम …
है भी या नहीं ?
उसने कहा ~ है न प्रभु,
मेरा नाम भैयालाल है.
प्रभु, मैं शुरू से अनपढ़ गँवार हूँ.
गाँव में मज़दूरी करता था.
एक बार गाँव में एक नामी सन्त
विद्या सागर जी के प्रवचन हुए.
प्रवचन तो मेरे पल्ले नहीं पड़े, लेकिन
एक लाइन मेरे दिमाग़ में आकर
फँस गई. उन संत ने कहा ~
★ हर इन्सान में प्रभु का वास है ★
तलाशने की कोशिश तो करो,
पता नहीं किस इन्सान में मिल जायें,
और तुम्हारा … उद्धार कर जायें.
बस उस दिन से मैंने
हर मिलने वाले को
प्रभु की नज़र से देखना और
पुकारना शुरू कर दिया.
वाकई … चमत्कार हो गया.
दुनिया के लिए शैतान 👺 आदमी भी
मेरे लिये प्रभु रूप हो गया.
ऐसे दिन फिरे, कि
मैं मज़दूर से व्यापारी हो गया.
सुख समृद्धि के सारे साधन जुड़ते गये.
मेरे लिये तो सारी दुनिया ही
प्रभु रूप बन गई.
◆ लाख टके की बात ◆
जीवन एक प्रतिध्वनि है.
आप जिस लहज़े में आवाज़ देंगे,
पलटकर आपको
उसी लहज़े में सुनाई देगी.
न जाने किस रूप में
आपको प्रभु मिल जाये
भानु प्रकाश शर्मा (मार्मिक धारा)
हर्षवर्धन शर्मा (मार्मिक धारा)