काबुल, अफगानिस्तान में तालिबान का कब्जा होने के बाद अमेरिका और आईएमएफ ने फंड रोक दिया है। तालिबान की हालत पैसे के अभाव में बदतर हो रही है। ऐसे में वह चीन से मदद की गुहार लगा रहा है।इसी क्रम में दोनों के बीच बातचीत हुई और तालिबानी प्रवक्ता ने कहा कि चीन ने अफगानिस्तान में शांति स्थापित कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और अब वक्त आ गया है कि चीन अफगानिस्तान के विकास में साथ दें। चीनी भी इसी फिराक मे था।
चीन का सर्वाधिक विदेशी निवेश अफगानिस्तान में:-
तालिबान अब तक मुख्य रूप से हसीनों हीरोइन के कारोबार से ही कमाई करता था अमेरिकी भूवैज्ञानिक बताते हैं कि अफगानिस्तान की जमीन में लोहा सोना लिथियम कोबाल्ट जिसकी कीमत 2010 में 75 लाख करोड़ थी जो अब बढ़कर 3 गुना हो चुकी है।चीन की इस खनिज संपदा पर नजर है क्योंकि इसका इस्तेमाल बड़े स्तर पर मोबाइल फोन, टीवी, कंप्यूटर, लेजर ,और बैटरी बनाने में हो रहा है।
लिथियम की प्रतिवर्ष मांग बढ़ना:-
इलेक्ट्रिक कार स्मार्टफोन लैपटॉप की बैटरी में प्रयोग होने वाला लिथियम की दुनिया में मांग बढ़ी है। पहले इसकी मांग 5 से 6% थी। रूस, चीन, पाकिस्तान संकट में अपने लिए अवसर तलाश रहे हैं।
बाइडेन ने दी तालिबान को चेतावनी:-
अफगानिस्तान सेना हटाने को सही ठहराते हुए राष्ट्रपति ने कहा हमने त्याग किया है। बलिदान दिया है और अफगानिस्तान में युद्ध खत्म करने का समय आ गया है। साथ ही तालिबानियों को चेतावनी दी कि अमेरिका सेना पर हमला बर्दाश्त नहीं करेगा बॉर्डर में आईएसआईएस और अन्य आतंकी संगठनों से हमले का खतरा बताया है। ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, सहित नाटो देश साथ हैं। जल्दी इस संबंध में जी-7 देशों की बैठक होगी।
चीन का पलड़ा भारी:-
तालिबान से सौदेबाजी मैं चीन का पलड़ा भारी है। रूस अमेरिका के विपरीत उसने अफगानिस्तान में लड़ाई नहीं लड़ी है। तो उसे फायदा मिलेगा हालांकि चीन की अपनी चिंताएं भी हैं। वह पश्चिमी शिंजियांग क्षेत्र में धार्मिक उग्रवाद को अस्थिर शक्ति बताता रहा है। पिछले महीने चीन के विदेश मंत्री और तालिबान की बैठक में शाहीन ने आश्वस्त किया था। कि अफगानिस्तान उदारवादी इस्लामी नीति अपना सकता है।
विकास शर्मा (मार्मिक धारा)