मैं एक साधारण घटना का वर्णन कर रहा हूं। जो कि अपने आप में रोचक है। मेरा एक दोस्त जो कि भरतपुर में हमारे घर के पास रहता था और वह मेरे साथ स्कूल में पढ़ता था। यह कहानी उसके जीवन से संबंधित एक काल्पनिक घटना है । इसका वास्तविक जीवन से कोई लेना देना नहीं है। इस कहानी में किसी समुदाय, लिंग, जाति, धर्म किसी की भी भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचाई गई है। इसका उद्देश्य आपके होठों पर मुस्कान बिखेरना है। यदि इस कार्य में सफल हो जाता हूं। तो यह मेरी पटकथा सफल हो जाएगी। यह मेरा पहला प्रयास है यदि इसमें कोई कमी रह जाती है तो मैं उसका क्षमा प्रार्थी है।
मेरा दोस्त रमेश शर्मा जिसने मेरे साथ पढ़ाई की तथा वह जयपुर में एक अच्छी कंपनी में अच्छे पद पर कार्य करता है। रमेश की उम्र 40 वर्ष है। शादीशुदा है तथा उसके एक बच्ची है। उसके माता-पिता भी उसके साथ रहते हैं। रमेश की जब शादी हुई तो उसे अच्छा वेतन नहीं मिलता था। लेकिन आज वह अच्छा वेतन पाता है। रोजाना की तरह वह अपने ऑफिस गया ऑफिस में अभी आधा घंटा ही हुआ था कि चपरासी आया और बोला
चपरासी—- अरे साहिब! आपको बड़े साहब बुला रहे हैं।
रमेश—- क्या हुआ?
चपरासी— पता नहीं उन्होंने कहा कि रमेश जी आए तो उनको बुला लाना।
रमेश—- ठीक है आता हूं।
रमेश अपने चेंबर से कुछ कागजातों को लेकर बड़े साहब के चेंबर में चल दिया।
रमेश—–मैं आई कम इन सर!
बॉस—–यस! रमेश बैठो। इस महीने तुम्हारे कार्य का फीडबैक बहुत ही बुरा है और पिछले कई महीनों से तुम्हारा फीडबैक सही नहीं आ रहा है। तुम्हारी नौकरी खतरे में पड़ जाएगी।
रमेश—- सर कुछ नहीं कुछ घर की परेशानी चल रही है। लेकिन इस महीने मैं प्रयास पूरा करूंगा।
बॉस—-घर की परेशानी घर पर रखें। ऑफिस में नहीं आनी चाहिए। इस महीने तुम्हें आखिरी वार्निंग है। अगले महीने तुम्हारी नौकरी जा सकती है। ऐसी शिकायत अगले महीने नहीं आनी चाहिए।
रमेश—- सॉरी सर! मैं वादा करता हूं। कि अगले महीने कोई शिकायत नहीं आएगी।
बॉस के चेंबर से बाहर निकल कर वह अपने चेंबर आया। उसका मूड खराब हो चुका था। फिर भी अपने कार्य में लग गया। कब 6बज गये उसे पता ही नहीं चला। ऑफिस से घर पहुंचा। दरवाजा खटखटाया घर के अंदर आया।
पत्नी—- आप मेरा फोन क्यों नहीं उठाते हो?
रमेश—- तुमने फोन कब किया?
पत्नी—-फोन में रिसीव कॉल होते हैं उनको देख लिया करो। लगभग 10:30 के आस पास फोन किया और आपने उठाया नहीं।
रमेश—-नहीं ऐसा नहीं है। 10:30 के आसपास मैं बॉस के चेंबर में था। इसलिए सुन नहीं पाया उसके बाद मेरा मूड खराब हो गया इसलिए मैंने अपने मोबाइल को देखा नहीं।
पत्नी—-मूड क्यों खराब हो गया।आप ऑफिस में कार्य ढंग से नहीं करते हो तो बॉस ने कुछ कहा होगा क्योंकि आपका ध्यान तो मुझसे लड़ने में रहता है।
रमेश—- नहीं लेकिन मैं कोई बहस नहीं करना चाहता तो तुम भी मत करो।
इतना कहने के बाद फिर तुम बहस मत करो पत्नी नाराज हो गई वह तेज तेज चिल्लाने लगी। रमेश चुपचाप अपने कमरे में जाकर सो गया। थोड़ी देर बाद रमेश ने देखा कि दो व्यक्ति जिन की बड़ी-बड़ी मूछें तथा विकराल स्वरूप हाथों में तलवार लेकर रमेश से कहा--
यमदूत— चलो हम यमराज के दूत हैं और तुम्हें यमलोक लेने आए हैं। तुम्हारी मृत्यु हो चुकी है।
रमेश—– मेरी मृत्यु हो चुकी है। चलो
यमराज के दूत पूरे रास्ते उस आत्मा यानी रमेश को परेशान करते आए। उसके कोडे भी लगाए। तेज धूप से उसके पैर जले। लेकिन रमेश की आत्मा ने कुछ नहीं कहा।
यमदूत—- प्रभु! हम इस आत्मा को लेकर आए हैं। बताएं क्या आज्ञा है? इसे स्वर्गलोक भेजें या मृत्युलोक!
चित्रगुप्त एक शालीन व्यक्ति जोकि एक वही खाता लेकर बैठे थे। रमेश की आत्मा की तरफ देख कर बोले।
चित्रगुप्त—- तुम्हारा पूरा नाम क्या है?
रमेश—- रमेश चंद शर्मा
चित्रगुप्त—- पिताजी का नाम तथा तुम्हारा पता क्या है?
रमेश—- महाराज! पिताजी का नाम कमलेश है। भरतपुर का रहने वाला हूं। इस समय जयपुर रह रहा हूं।
चित्रगुप्त—- मूर्खों! किस को लेकर आ गए? इसका जीवन तो बहुत है तुमको रमेश चंद्र अग्रवाल को लेकर आना चाहिए था। उसकी उम्र 80 साल है। तुम इस आत्मा को गलत लेकर आए इसे वापस मृत्युलोक भेजो।
इस बात को सुनकर दोनों यमदूतों ने रमेश को पकड़ा तो रमेश चिल्लाया और बोला-
रमेश—– प्रभु! मैं वापस मृत्यु लोक नहीं जाना चाहता हूं। मुझे यही रहना है।
तभी एक यमदूत चित्रगुप्त के कान में बोला
यमदूत—–(कान में) महाराज! हम पूरे रास्ते इसको कष्ट देते रहे लेकिन इसको दर्द का एहसास ही नहीं हुआ।
चित्रगुप्त—- रमेश यह हमारे हाथ में नहीं है कि हम बिना समय पूरा हुए तुम्हें यहां रखें इसलिए तुम्हें जाना ही पड़ेगा।
रमेश—- महाराज कुछ भी हो जाए मैं नहीं जाऊंगा।
चित्रगुप्त—- तो तुम्हें हमारे राजा यमराज के पास चलना होगा। वही इसके बारे में फैसला करेंगे।
चित्रगुप्त रमेश को अपने साथ लेकर यमराज के महल गये। यमराज से बोले (यमराज एक विशालकाय शरीर वाले, सोने के मुकुट पहने हुए थे)
यमराज—- “कैसे आना हुआ चित्रगुप्त?
चित्रगुप्त—– महाराज की जय हो! महाराज यह आत्मा गलती से यमलोक आ गई है और उसका समय पूरा हुआ नहीं है।
यमराज—- कोई बात नहीं इसे वापस मृत्युलोक भेज दो।
चित्रगुप्त—- प्रभु! सबसे बड़ी समस्या यह वापस मृत्युलोक नहीं जाना चाहता है।
यमराज—- क्यों नहीं जाना चाहता है? रमेश तुम क्यों मृत्यु लोक वापस नहीं जाना चाहते हो?
जैसे ही यमराज ने रमेश से पूछा वैसे ही रमेश बुरी तरह से रोने लगा।
रमेश—- प्रभु! मैं मृत्यु लोक में बहुत परेशान हूं ।यह बहुत लंबी कहानी है।
यमराज—- रमेश धैर्य धारण कर अपनी समस्या हमें सुनाओ।
रमेश— प्रभु! हम तीन भाई बहन हैं। मैं सबसे छोटा हूं। मेरे से बड़ी एक बहन एवं एक भाई है। जब मेरे भाई की शादी हुई तो मेरी मां कहती थी कि तेरे भाई में अंतर आ गया है कि मैं जब तेरी भाभी की शिकायत करती हूं तो तेरा भैया कुछ नहीं बोलता है और चुप हो जाता है। भाभी और मां के झगड़े में वह बिल्कुल चुप रहते थे।इस बात को लेकर मुझे गुस्सा आता था कि भैया कुछ बोलते नहीं है। मैं सोचता था यदि मेरी शादी हो जाएगी तो मैं ऐसा नहीं करूंगा तथा अपनी पत्नी को डॉट लगाऊंगा।
कभी-कभी जब मेरी बहन की ससुराल में लड़ाई हो जाती थी और मेरी मां जीजा जी से कुछ कहती तो वह भी चुप लगा जाते थे।बहन की ससुराल में जीजा जी की मां बोलती है मेरी बहन जवाब देती तो मैं भी बोलता बोलता था फिर भी जीजाजी चुप रहते थे। इस चुप्पी का राज मैं समझ नहीं पाया। मेरी शादी हुई। प्रभु! मात्र शादी के 3 महीनों में मुझे इस चुप्पी का राज समझ आने लगा।
प्रभु! बचपन में हमने अपनी मां को देखा जोकि बीसवीं सदी की थी और हम भी बीसवीं सदी की पत्नी चाहते थे लेकिन प्रभु! पत्नी हमें 21वीं सदी की मिली। 21वीं सदी की पत्नी पति का सुनना अनपढ़ता समझती है उसे कानून का संपूर्ण ज्ञान है। देश का कानून 21वीं सदी की नारी को अबला कहकर उसका पूरा संरक्षण करता है। पति के उत्पीड़न के लिए कोई धारा नहीं है यदि है भी तो उनको कोई सुनता नहीं। नारी यदि किसी पुरुष के बारे में कुछ कहे तो और 100 तरीके के कानून है इस तरीके से पुरुष का जीना मुश्किल हो जाता है।
शादी के बाद पति एक ऐसी फुटबॉल बन जाता है जोकि दोनों तरफ से ठोकर खाती है। लेकिन किसी भी गोल में नहीं पहुंचती है। पत्नी की तरफ बोले तो मां कहती है बीवी का गुलाम, यदि मां की तरह बोले तो ससुराल में जाना मुश्किल तो फिर इस बेचारे पति को चुप्पी (खामोशी) का सहारा लेना पड़ता है।
प्रभु! मेरा एक मित्र जिसकी कंपनी में एक महिला कार्य करती है। उसने ऑफिस के कार्य करने के लिए कहा उस महिला ने उत्पीड़न का आरोप लगा दिया। बेचारा घर पर भी अपनी सफाई देता है कि मेरा दोष नहीं है लेकिन लोग उसको उसी नजर से देखते हैं। प्रभु! शादी से पहले खुश थे। जीवन बड़ा शानदार तरीके से बीत रहा था। लेकिन अब लग रहा है जीवन ढंग से चल नहीं रहा है।
चुपचाप सारी बातें सुनकर यमराज हंसे। यमराज रमेश को अपने कमरे में लेकर गए वहां एक बड़ी दीवार जो कि एलईडी का कार्य कर रही थी।
यमराज बोले— रमेश जरा इधर आओ और देखो तुम्हारे जाने के बाद सबसे बुरा हाल किसका हो रहा है?
रमेश को देखा कि उसकी पत्नी बुरी तरह से रो रही है और उसके माता-पिता का भी हाल बेहाल हो रहा है।
तभी यमराज बोले— रमेश तुम्हारे जाने के बाद सबसे दुखी तुम्हारी पत्नी है और तुम्हारे माता-पिता है। जो लोग तुम्हारा ध्यान रखते हैं वह तुमसे नाराज भी होते हैं। तुमने पत्नी का एक पक्ष देखादूसरा पक्ष तुम्हारे खाने-पीने का ध्यान तुम्हारी पूरी देखभाल तुम्हारे बच्चों का ध्यान रखती है। अनजान जगह आकर सब को अपना बनाने की कोशिश करती है। तुम्हारे माता-पिता की सेवा करती है। तुम्हारा कर्तव्य बनता है कि तुम्हें अपने परिवार में सामंजस्य बना कर चलना चाहिए। तुम्हें कोशिश करनी चाहिए कि सभी को खुश रखो। तुम्हें भी इस खामोशी (चुप्पी) का सहारा लेना चाहिए।
रिश्तो को निभाने के लिए खामोशी (चुपचाप रहना) सबसे अच्छा है। रमेश की यह बात समझ आ गई। वह खुशी-खुशी मृत्यु लोक जाने को तैयार हो गया। 3 घंटे बाद जब उसकी आंखें खुली तो उसने देखा कि वह एक सपना देख रहा था। वह माता पिता व पत्नी को देखकर बहुत खुश हुआ। उसमें अपने माता पिता के पैर छुए उनसे उनका हालचाल पूछा अपनी पत्नी के पास गया। और बोला
रमेश—- मुझे माफ कर देना मैं तुम्हारा फोन नहीं देख पाया। आगे से ऐसा नहीं होगा।
पत्नी— इसमें माफी मांगने की कोई बात नहीं बस मैं तो इतना कह रही थी कि मेरा फोन उठा लिया करो।
इस तरीके से रमेश को खामोशी का महत्व समझ में आ गया और वह अपना जीवन खुशी-खुशी जीने लगा।
यदि रिश्तो को निभाना है तो खामोशी (चुपचाप रहने) की आवश्यकता है।