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भारतीय अर्थव्यवस्था की समस्याएं।

by marmikdhara
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पाठकों आज हम अर्थव्यवस्था पर विचार विमर्श करेंगे। वर्तमान स्थिति के संदर्भ में भारत के पूर्व गवर्नर रघु राजन ने भारत की अर्थव्यवस्था के बारे में यह कहा है कि “भारत की अर्थव्यवस्था एक बीमार आदमी की तरह है जिसका एक्सीडेंट हो गया है।” भारत की अर्थव्यवस्था नोटबंदी और जीएसटी से उबर पाई नहीं थी कि तुरंत कोविड-19 और नीचे ला दिया। भारत या किसी भी देश में आरबीआई जैसी संस्थाओं को स्वायत्त रखा जाता है। लेकिन विकास की जल्दबाजी ने भारतीय अर्थव्यवस्था को डावाडोल कर दिया। सरकार ने नोट बंदी का फैसला आतंकी संगठन को तोड़ने के लिए किया था जो कि अपने आप में सही था लेकिन इसका नकारात्मक प्रभाव ने अर्थव्यवस्था को हिलाकर धर दिया। जीएसटी के फैसले व नोटबंदी के फैसले में सरकार को थोड़ा अंतर रखना चाहिए था। यह अंतर कम से कम 3 साल का होना चाहिए। व्यापार जगत में इन दोनों फैसलों से त्राहिमाम मच गया। तीसरा आरबीआई की कुछ सीमाएं होती हैं। आरबीआई अपने निर्णय अपने तरीके से लेता है। इस समय सरकार में जल्दी विकास या भारतीय शहरों को स्मार्ट सिटी बनाने के चक्कर में धन को अत्यधिक खर्च कर दिया।हम मानते हैं कि यदि हमें विदेशी निवेश चाहिए तो हमारा आधारभूत ढांचा अच्छा होना चाहिए लेकिन आधारभूत ढांचा तुरंत सही नहीं हो सकता। आरबीआई सरकार को सीमित धन उपलब्ध कराती है।जिसमें सरकार अपने देश में योजनाओं इत्यादि को क्रियान्वित कर सके। जीएसटी जिस देश में जहां लगा वहां वहां मंदी लाया है। अर्थशास्त्रियों के मना करने पर भी सरकार ने जीएसटी को लागू करा। तीसरा कोविड-19 हमारी अर्थव्यवस्था को धराशाई कर दिया। अनुमानित जीडीपी -23.9%(असंगठित क्षेत्रों को छोड़कर) की गिरावट दर्ज की गई है। इटली में जीडीपी -12.4% है। अमेरिका में -9.5 % है। चीन की अर्थव्यवस्था सुचारू है।भारतीय अर्थशास्त्रियों ने अनुमान लगाया है कि सरकार यदि और अधिक राहत पैकेज देती है तो 2021 में 7% जीडीपी में सुधार हो सकता है। भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए 7% का सुधार भी एक बड़ा लक्ष्य है। चीन, अमेरिका, इटली, रूस इन सभी विकसित देशों की अर्थव्यवस्था आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था है। इसलिए हमारे माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी भी भारत देश को आत्मनिर्भर भारत बनाना चाहते हैं। उनका कहना भी सही है। भारत जब तक आत्मनिर्भर नहीं होगा तब तक वह विकास भी नहीं कर सकेगा। दूसरी तरफ कोविड-19 के कारण विदेशी कंपनियों जिन्होंने चीन को छोड़ा था उनके पास दो विकल्प थे भारत व वियतनाम जिनमें अधिकतर कंपनियों ने वियतनाम देश में अपनी नई शुरुआत की है। भारत में वही कंपनियों ने अपनी कंपनी खुली है जिन को भारतीय बाजार की आवश्यकता थी। जिनकी संख्या भी बहुत कम है। उसका मुख्य कारण भारत में जो आधारभूत ढांचा है वह बहुत कमजोर है। इसका फायदा वियतनाम देश को मिल गया। ऐसी स्थिति में भारत को आत्मनिर्भर बनाना उतना ही कठिन है जैसे दसवीं पास बच्चे को आईएएस की परीक्षा दिलवाना।

      इन सभी समस्याओं के होने के बावजूद यदि हमारा देश आत्मनिर्भर बन जाता है। तो हमारी अर्थव्यवस्था भी विकसित देशों की अर्थव्यवस्था को टक्कर दे सकती है। हमारे देश के प्रधानमंत्री ने इस ओर सोचना शुरू किया है। वर्तमान में आत्मनिर्भर शब्द थोड़ा कठिन है लेकिन यदि हम इस ओर सोचना शुरु करेंगे तो कुछ वर्षों में इसके अच्छे प्रभाव भी दिखाई देंगे। आज हमारी सरकार  प्रयास करती है। तथा प्रयासों को तुरंत लागू भी करती है। दो-तीन वर्ष व्यापार जगत के लिए कठिन है। लेकिन इसके बाद का समय भारत देश का है।
  हर्षवर्धन शर्मा (मार्मिक धारा)

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