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सज्जनों का जमाना नहीं है।

by marmikdhara
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पाठकों आज हम जीवन मूल्यों के बारे में चर्चा कर रहे हैं। वैसे तो आज के युग में जीवन मूल्यों का कोई महत्व नहीं है। मित्रों, यह घटना एक सत्य घटना है केवल पात्रों को बदला गया है। समझने की कोशिश करना ।इस कलयुग में सच्चे और ईमानदार व्यक्ति का जीना कितना मुश्किल है?

        यह घटना मार्च 2020 की है।मेरे ससुर साहब के दोस्त जो कि एक प्राइवेट विद्यालय में अध्यापन कराते हैं। उनका नाम विमल है। उनके दो पुत्र हैं तथा एक पुत्री है। एक पुत्र और एक पुत्री की शादी हो चुकी है। पुत्र का नाम कमलेश है। पुत्री का नाम प्रियंका है। कमलेश एक सरकारी अध्यापक है।
  (नवंबर 2019 में मैं जब अपने ससुराल गया तो मैं उनसे भी मिल कर आया। मैं विमल जी के घर पहुंचा तो वह बोले।)

विमल जी—- आइए हर्ष जी, आज तो बहुत दिन बाद आप आए हैं। ससुराल आ जाते हो लेकिन हमसे मिलकर नहीं जाते हो।
हर्षवर्धन— नहीं जी, ऐसा नहीं है। गुरुजी जब भी मैं ससुराल आता हूं। आपसे मिलकर जरूर जाता हूं। आज मैं पूरे 6 महीने बाद आया हूं। इसलिए आप को ऐसा लग रहा है।
(विमल जी अपनी पत्नी को कहते हैं)
विमल जी— सुनती हो! देखो कौन आया है?
विमल जी की पत्नी— कौन आया है? (ऐसा कहते हुए। वह बाहर आए, मैंने उनके पैर छुए , उन्होंने कहा-)
विमल जी की पत्नी—सर जी हमारे यहां दामाद ओ से पैर नहीं छू आते हैं। आप पर मत छुए। अच्छा, घर पर सब ठीक है। आपके माता पिता का स्वास्थ्य ठीक है।
हर्षवर्धन— मेरे माता-पिता का स्वास्थ्य ठीक है। मेरे माता पिता जी आपको बहुत याद करते हैं। बड़ों के पैर छूने में क्या एतराज है? (तभी मैंने पूछा)–आपका बड़ा बेटा अध्यापक बन गया है बड़ी खुशी की बात है। वह कहां है?
विमल जी— अभी तो यहीं पर था पता नहीं कहां चला गया?
(तभी उनका छोटा बेटा आया उसने मेरे पैर छुए। छोटा बेटा बहुत अधिक सीधा और शर्मीला था तथा पढ़ाई में बहुत अधिक होशियार था। छोटे बेटे का नाम रमन था।)
रमन— नमस्ते जीजा जी
हर्षवर्धन—नमस्ते! बहुत बड़े हो गए हो। अब क्या कर रहे हो?
रमन— जीजा जी, STC कर रहा हूं। साथ ही प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा हूं। मेरा लक्ष्य है कि अगली साल तक जब मेरी STC पूरी होगी तभी मैं भी किसी प्रतियोगी परीक्षा में परीक्षा में उत्तीर्ण होकर नौकरी प्राप्त कर लूंगा।
हर्षवर्धन—बहुत अच्छी बात है। यदि तुम ऐसे ही पढ़ाई करते रहोगे तो जरूर परीक्षा पास कर लोगे।
पाठको यह घटनाक्रम नवंबर का था ।मैं जयपुर आ गया। तभी 22 मार्च को देश भर में लॉक डाउन हो गया। लोक नाम के दौरान 26 मार्च को मैं नवरात्रा
कर रहा था। शाम के 6:00 बज चुके थे।

हर्षवर्धन—मेरा मन नहीं लग रहा है। पता नहीं मन खराब हो रहा है। मैं पूजा करता हूं।

पत्नी— मेरा मन भी विचलित हो रहा है। व्रत का खाना भी अच्छा नहीं लग रहा।
(तभी मोबाइल की घंटी बजती है।)
विमल जी– (ससुर साहब के मित्र) हर्षजी, सब बर्बाद हो गया।
हर्षवर्धन— क्या हुआ? आप घबराएं नहीं कृपया आराम से बताएं।
विमल जी— मेरे छोटे बेटे को गांव के दो लड़के व उसके माता-पिता ने मिलकर मार दिया। (रोते हुए बोले)
हर्षवर्धन—- यह तो बहुत बुरा हुआ ।किस लिए मारा?
विमल जी— हर्ष जी, पता नहीं चला गांव के लोगों ने मौके पर पकड़ लिया। पुलिस डेढ़ घंटे बाद आई। पुलिस में उनका रिश्तेदार बड़ा अधिकारी है। इसलिए पुलिस बिल्कुल भी सहयोग नहीं कर रही है। (रोते हुए) मेरे बेटे को मार दिया। पुलिस उनसे पूछताछ नहीं कर रही है। मैं क्या करूं? आप मेरी सहायता करो।
हर्षवर्धन— (मैं जो कि जयपुर में था) मैंने पुलिस अधिकारी को फोन किया।
(मैंने फोन मिलाया वहां घंटी बजी थोड़ी देर बाद मेरा फोन SHO ने उठाया।)
हर्षवर्धन—हेलो सर! मैं जयपुर से हर्षवर्धन शर्मा बोल रहा हूं। एक युवक की हत्या हो गई है। एफ आई आर नंबर यह है। सर! उस लड़के को क्यों मारा इसका कुछ मालूम हुआ?
SHO– आप मेरे पुलिस अधिकारी हैं ।आपको मैं क्यों बताऊं?
हर्षवर्धन— सर! वह बच्चा मेरा जानकार है। इसलिए मैं आपसे पूछ रहा हूं।
SHO— मैं आपको जानकारी देना उचित नहीं समझता।
हर्षवर्धन— मैं एक पत्रकार बोल रहा हूं। मेरा अधिकार है। आपसे जानकारी लेना कृपया मुझे बताइए।
(तब कहीं जाकर एसएचओ ने हमें बताया)
SHO— पत्रकार साहब जांच चल रही है।
हर्षवर्धन– सर! आप समझ नहीं रहे हैं। मैं जानकारी मांग रहा हूं। कोबिड के कारण आपके पास में अभी नहीं आ सकता लेकिन आपसे जानकारी मांग रहा हूं।
SHO— सर! मारने वालों को पकड़ लिया है।
हर्षवर्धन— लेकिन सर FIR में चार लोग हैं। आप ने चारों को मौके से पकड़ने के बाद दो को छोड़ दिया।
SHO—नहीं सर! दो ही अपराधी हैं।
(इस प्रकार पुलिस ने जांच का बहाना बनाकर मेरी बात टाल दी। गांव में गमहीन माहौल था। विमल के पिता चारपाई पर लेटे हुए थे और गांव के लोग हर तरफ बैठे हुए थे।)
गांव के लोग— गुरुजी (विमल जी) आपके बच्चे को न्याय जरूर मिलेगा। हमारे सामने आपके बच्चे को मारा है। हम कोर्ट में जाकर गवाही देंगे।
विमल जी— लेकिन पुलिस हमारी सहायता नहीं कर रही है। क्या करें?
हर्षवर्धन— आप चिंता मत करिए। हम कोर्ट में अपनी बात कहेंगे।
लेकिन मित्रों को कोबिड के कारण कोर्ट में गवाही नहीं हो रही है। पुलिस अधिकारी से कई बार गुहार लगाने के बाद उस SHO को अधिकारी निर्देश देते हैं। लेकिन वह विमल जी व गांव के चश्मदीद गवाहों के बयान दर्ज कर कोर्ट में पेश नहीं कर रहा है। पुलिस कोर्ट तक केस को पहुंचने ही नहीं देती है। अंग्रेजो के द्वारा बनाई गई इस पुलिस व्यवस्था में आज परिवर्तन की बहुत आवश्यकता है। लेकिन हमें न्याय व्यवस्था पर पूरा भरोसा है। चाहें पुलिस कितना हमारा रास्ता रोके?

हर्षवर्धन शर्मा (मार्मिक धारा)

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