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नारी जीवन की कलयुग में विडंबना— श्राप या वरदान

by marmikdhara
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पाठकों ” जीवन जीने की कला” नामक शीर्षक के अंतर्गत एक नई कहानी लिख रहा हूं। इस कहानी का उद्देश्य कामकाजी महिलाओं पर आधारित है। कामकाजी महिलाओं को छोटे शहरों एवं गांव में कार्य करना बड़ा मुश्किल है। मेट्रो शहरों में महिलाओं का घर से बाहर जॉब करना एक आम बात है। लेकिन छोटे शहर, गांव में महिलाओं का कार्य करना बड़ा मुश्किल है। आज 21वीं सदी में गांव छोटे शहरों में कामकाजी महिलाओं को गलत तरीके से देखा जाता है। हम चाहे कितना भी पढ़ लिख लेते हैं लेकिन हमारी सोच अभी भी बहुत कमजोर है। सनातन धर्म में स्त्री व पुरुष को बराबर का दर्जा दिया गया है। स्त्री को पुरुष की अर्धांगिनी माना जाता है। स्त्री व पुरुष में कोई अंतर नहीं है।जो पुरुष के मन में भाव है वही स्त्री के मन में भाव हैं। फिर क्यों हम स्त्री और पुरुष में अंतर करते हैं? कुछ गलत मानसिकता वाले पुरुष एक स्त्री को गलत नजर से देखते हैं। उसे गलत करने पर मजबूर कर देते हैं। ऐसी मानसिकता बड़े शहरों में कुछ कम है। बड़े शहरों में महिलाएं सभी कार्य पुरुषों के समान करते हैं। बड़े शहर में दुकान पर महिलाएं कार्य करती हैं। जिम चलाती हैं तथा वह सभी कार्य करती है जो पुरुष करते हैं। इसलिए बड़े शहरों में लगभग स्त्री पुरुष में कोई अंतर नहीं है। लेकिन छोटे शहरों व गांव में महिलाएं को बिल्कुल भी बराबर का दर्जा नहीं दिया जाता है। इसलिए महिलाओं पर उत्पीड़न गांव व छोटे शहरों में अधिक होते हैं। लेकिन ये उत्पीड़न सरकारी आंकड़ों में नहीं आ पाते हैं। आज हम एक बड़ी समस्या पर विचार कर रहे हैं। यदि समस्या को आप महसूस कर सके तो यह कहानी मेरी सफल हो जाएगी।
पाठकों यह कहानी रूबी की है। जो कि अपने मां-बाप की इकलौती बेटी है। उसका एक भाई भी है। रूबी पढ़ने में बचपन से बहुत होशियार है। उसके पिताजी जिनका नाम विनोद है जो कि एक सरकारी विद्यालय में अध्यापक है। रूबी पढ़ाई के साथ साथ अच्छे संस्कार वाली लड़की है। यह लोग भरतपुर में रहते हैं। जिस कॉलोनी में रहते हैं वहां सभी रूबी की प्रशंसा करते हैं। रूबी बहुत हंसमुख तथा अपनी मां के कार्य में सहयोग करने वाली लड़की है। 12वीं पास होने के बाद रूबी ने एलडीसी परीक्षा पास कर ली। वह प्रशासनिक सेवा में जाना चाहती थी।लेकिन प्रशासनिक सेवा की तैयारी के लिए दूसरे शहर यानी जयपुर जाना पड़ता है इसलिए उसने भरतपुर में रहकर तैयारी की तथा नगरपालिका में वह बाबू बन गई। नौकरी लगने के बाद रूबी के पिताजी ने लड़का ढूंढना प्रारंभ कर दिया। एक लड़का जो कि महाविद्यालय में प्राध्यापक था जिसका नाम विमल था। रूबी के पिताजी को वह लड़का पसंद आ गया। लड़के वाले रूबी को देखने आया।
(लड़के वाले रूबी को देखने उसके घर पर बैठ कर नाश्ता कर रहे थे)
विनोद जी— हमारी बेटी बड़ी सुशील व संस्कारी है तथा घर के सभी कार्यों में निपुण है।
लड़के की मां — विनोद जी नौकरी करती है तो घर के कार्यों को तो शायद कम ही जानती होगी।
विनोद जी— नहीं, समधन जी ऐसा नहीं है। वह घर के कार्य में बहुत रुचि रखती है।
(कुछ दिनों बाद अच्छे मुहूर्त में विमल व रूबी की शादी कर दी गई। विमल की एक छोटी बहन थी जिसका नाम संगीता था। वह रूबी को बिल्कुल पसंद नहीं करती थी। रूबी के सास ससुर दोनों ही अनपढ़ थे। केवल विमल जो कि एक प्राध्यापक था। वही उनके घर में अच्छा पढ़ा-लिखा लड़का था। शादी के 10 साल बाद तक रूबी अपनी नौकरी कर रही है। तथा उसका जीवन बड़ा शांतिपूर्वक चल रहा था। तभी नगर पालिका में एक सरकारी अफसर स्थानांतरण होकर रूबी के ऑफिस में उसने जॉइन किया था। वह ऑफिसर चरित्रहीन था तथा शराबी था एवं सारे अवगुणों से सुसज्जित था। तथा ऑफिस में सभी महिलाओं को वह घूरने लगा।
(रूबी और उसकी सहकर्मी महिला सविता लंच में दोनों खाना खाते हुए बातें कर रहे थीं।)
सविता— रूबी तुझे मालूम है कि जो यह अफसर आया है यह अब्बल दर्जे का चरित्रहीन व शराबी है। पता है जब इस ने ज्वाइन किया तो कैसे सबको घूर रहा था।
रूबी— सविता हमें क्या मतलब? हमें तो अपने काम से काम रखना है उसकी पर्सनल लाइफ से हमें क्या लेना देना।
सविता— कल मुझसे मेरी पसंद पूछ रहा था।
रूबी– तो तुमने क्या कहा?
सविता— कुछ नहीं कहा।
(अभी चपरासी आया और बोला मैडम रूबी आपको साहिब बुला रहे हैं।)
सविता— शैतान का नाम लिया और शैतान हाजिर। जरा देख क्या कहता है?
रूबी— मुझसे क्या कहेगा?
(उस अधिकारी का नाम शक्ति सिंह था। वह चरित्रहीन व शराबी के साथ साथ वदमिजाज भी था। तभी रूबी शक्ति सिंह के कमरे में जाने से पहले उससे अनुमति मांगते हैं।)
रूबी– मैं अंदर आ सकती हूं।
शक्ति सिंह–हां, रूबी तुम अंदर आ सकती हो।
रूबी– सर बताइए क्या काम था?
शक्ति सिंह– अरे बैठो! कभी हमारे पास भी बैठ जाया करो। मैं ऑफिस में अकेला रहता हूं। मेरे पास आकर कोई नहीं बैठता।
रूबी— सर आप कैसी बातें कर रहे हैं। प्लीज सर मुझसे इस तरीके से बात मत करो।
शक्ति सिंह —(घिघियाते हुए) अरे मैडम आप तो बुरा मान गई। मेरा कहने का मतलब था कि मुझे ड्राफ्टिंग लिखानी होती है तो आप उस समय बैठकर मैं बोलता जाऊंगा और आप लिखती जाएं। बस इतना सा मतलब था।
रूबी— सर जब आपको कुछ लिखा ना हो तो मुझे बुला लेना ठीक है। सर! मैं जाऊं।
शक्ति सिंह—हां जाओ।
(बाहर आकर रूबी अपनी कुर्सी पर बैठ गए। तभी पास वाली कुर्सी से आकर सविता ने पूछा–“क्या बात हुई”
रूबी ने कहा–“कुछ नहीं”
(रूबी का कुछ मूड खराब हुआ लेकिन थोड़ी देर बाद उसने इस बात को नजरअंदाज कर दिया । शाम के 5:00 बज चुके थे। उसने घर जाने की तैयारी कर ली।
(घर का दृश्य)
(हम पहले बता चुके हैं कि विमल की एक बहन है जिसका नाम संगीता है तथा उसके माता-पिता है।)
विमल– संगीता कुछ घर का काम भी कर लिया कर। सारे दिन बातें करती है या इधर-उधर घूमती रहती है।
संगीता—भैया मुझसे फालतू बातें मत करा करो।
(ऐसा कहकर संगीता अपनी मां के कमरे में जाकर रोने लगी।)
विमल की मां—क्या बात हो गई? क्यों रो रही हैं? किसी से झगड़ा हो गया क्या?
संगीता–यह भैया हमेशा मुझसे काम की कहता है। भाभी से कुछ नहीं कहता है। वह कमाती है इसलिए भैया ने भाभी को सर पर चढ़ा रखा है।
विमल की मां—विमल! संगीता से कुछ मत कहा कर वह कुछ काम नहीं करेगी अगर काम की कहना है तो अपनी महारानी से कहना।
(तभी रूबी ऑफिस से घर के अंदर प्रवेश करती है)
रूबी—क्या हुआ?
विमल की मां—ले आ गई महारानी। भाई कमाकर लाती है। इसलिए विमल तेरी औकात ही नहीं है। कि कुछ कह सके। इसलिए तुझे मेरी बेटी नौकरानी दिखती है। आगे से मेरी बेटी से कुछ काम की कहा तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।
(रूबी यह सब सुनकर रोने लग जाती है। विमल चिल्लाते हुए कहता है।)
विमल—यह सब तेरी वजह से होता है। ऑफिस जाने से पहले घर का काम क्यों नहीं करके जाती है? अब आंसू बहा रही है।
(रूबी बिना आराम करें रोते रोते घर का सारा काम करती है।)
(दूसरे दिन ऑफिस पहुंचती है)
चपरासी—रूबी मैडम! बड़े साहेब आपको बुला रहे हैं।
(रूबी बड़े साहेब के कमरे में जाती है।)
रूबी– मैं अंदर आ सकती हूं सर!
शक्ति सिंह— हां आ जाओ। तुम क्यों पूछती हो? तुरंत अंदर आ जाया करो (गलत अंदाज में वह बोला)
रूबी—सर आपने क्यों बुलाया है?
शक्ति सिंह—एक लेटर लिखना है।
रूबी—बोलिए सर!
शक्ति सिंह– पहले हेडिंग डालो “प्रेम पत्र”
रूबी—सर! आप क्या बकवास कर रहे हैं?
शक्ति सिंह—मैं तुम्हारा बॉस हूं जैसा कह रहा हूं वैसा लिखो। मैं किसी और को लेटर लिख रहा हूं तुमको नहीं।
रूबी—नहीं सर! मैं नहीं लिख सकती हूं।
शक्ति सिंह—बकवास बंद कर ज्यादा बोलती है। तेरी जैसी औरतों को मैं ठीक करना अच्छी तरीके से जानता हूं। ज्यादा सती सावित्री बनती है देख तुझे मैं कैसे बदनाम करता हूं।(तभी शक्ति सिंह रूबी का हाथ पकड़ लेता है। हाथ छुड़ाते हुए रूबी चिल्लाती है। तभी सारा स्टाफ आ जाता है।)
रूबी —छोड़ मेरा हाथ! तेरी हिम्मत कैसे हुई? (बहुत जोर से रोती हुई)
शक्ति सिंह—झूठ बोल रही है। उल्टा इसने मेरा हाथ पकड़ा है। मुझे झूठा फंसा रही है।
(अपनी कुर्सी पर आकर रूबी रोने लग जाती है। तभी सविता उसके पास आती है।)
सविता—रूबी चुप हो जाओ।
ऐसे परेशान मत हो
(रोती हुई रूबी अपने घर पहुंचती है। घर के अंदर प्रवेश करती है। संगीता दरवाजे के पास फोन पर बातें कर रही थी। रूबी सीधे अपने कमरे में जाकर रोने लग जाती है। संगीता तुरंत अपनी मां के पास जाती है।)
संगीता—मम्मी आज भाभी रोती हुई आ रही है।
विमल की मां—अभी से भाभी कहां से आ गई है? 2 घंटे पहले ही तो ऑफिस गई थी। इतनी जल्दी कैसे वापस आ गई?
संगीता–यह तो मां आप भैया से बोलो क्या बात है?
(थोड़ी देर बाद भैया घर में प्रवेश करते हैं। तभी विमल की मां व संगीता दोनों रूबी की कमरे में प्रवेश करते हैं।)
विमल—क्या हुआ? सविता का फोन आया था। क्या बात हो गई।
रूबी —(रोते हुए) मेरे बॉस शक्ति सिंह ने मुझसे गलत व्यवहार किया तथा मेरा हाथ पकड़ लिया।
विमल—(गुस्से में) मैं उसे छोडूंगा नहीं चल मेरे साथ।
विमल की मां–कहां जा रहे हो? क्यों हमारी नाक कटवाने पर दोनों तुले हुए हो? उसका कुछ नहीं होगा। हमारी नाक कट जाएगी। इसमें जरूर कोई ऐसी हरकत की होगी। नहीं तो उसकी हिम्मत कैसे हुई?
संगीता—मैं तो भाभी को काफी समझाती हूं। मेकअप कम किया करो।
रूबी–संगीता तूने मुझे मेकअप करते कब देख लिया?
विमल—चुप रह! मां सही कह रही है। तूने ही कोई ऐसी हरकत की होगी तभी उसकी इतनी हिम्मत हुई।
(यह सुन रूबी शून्य होकर खड़ी की खड़ी रह गई। उसे सारी रात नींद नहीं आई और मन ही मन उसने फैसला किया कि वह नौकरी छोड़ देगी। अगले दिन इस्तीफा लेकर वह ऑफिस पहुंची। जैसे ही वे ऑफिस पहुंची बाहर ही सविता उसे मिल गई। सविता को गले लगकर रूबी रोने लगी। सविता उसे ऑफिस के बगीचे में ले गई।)
रूबी—सविता मैं नौकरी छोड़ रही हूं। घर पर भी सभी ने मुझे ही दोषी ठहराया। 21वीं सदी में हम स्त्री पुरुष को समान मानते हैं। लेकिन ऐसा नहीं है। स्त्री को देवी का स्वरूप माना जाता है। लेकिन ऐसा नहीं है। पुरुष स्त्री के साथ कितना भी बुरा बर्ताव करें। प्रताड़ित स्त्री को ही होना पड़ता है। इस संसार में कितने बलात्कार या शारीरिक शोषण होते हैं। सजा उसी बलात्कार पीड़िता को ही भोगनी पड़ती है। समाज उसे भला बुरा कहता है तथा उसका तिरस्कार करता है। कि कोई भी पुरुष किसी महिला पर जो अपनी गंदी नजर डालता है। तो उसे अपनी मां व बहन के बारे में भी सोचना चाहिए कि कोई उसकी मां या बहन के साथ ऐसा व्यवहार करें। तो उसको कैसा लगेगा? इस संसार में भेदभाव होता है और होता रहेगा परिवार भी महिला का साथ नहीं देता तो तभी गंदी मानसिकता रखने वाले पुरुषों के हौसले बुलंद हो जाते हैं। मैं हार गई इसलिए नौकरी छोड़ रही हूं।
(तभी सारा स्टाफ बाहर गार्डन में आ जाता है)
कर्मचारी—मैडम आपको बिलकुल डरने की जरूरत नहीं है। हम आपके साथ हैं। पूरा स्टाफ आपके साथ है। हमने आज सुबह उसका काला मुंह करके यहां से भगा दिया।
सविता—रूबी तू बिल्कुल चिंता मत कर सुबह सभी ने बताया कि उस अधिकारी का काला मुंह कर दिया है तो मैंने तुम्हारे पति को समझाया वह भी अभी आ रहे हैं।
(तभी भीड़ में पीछे से विमल, उसके माता-पिता व संगीता सभी आ गए)
विमल—तू बिल्कुल चिंता मत कर रूबी। हम तेरे साथ हैं। हमसे गलती हो गई ।
संगीता—मुझसे गलती हो गई भाभी।
माता पिता—बेटा तू हमारी बहू नहीं बेटी है। हम तेरे साथ हैं और साथ रहेंगे तू बिल्कुल भी चिंता मत कर।
(इस प्रकार विमल से गले लग कर रूबी खुशी से रोने लगी)
मित्रों जीवन में सबसे बड़ी समस्या संवाद है। पिता पुत्र के बीच संवाद नहीं है। पति पत्नी के बीच संवाद नहीं है। हमें अपनी सारी समस्याएं एक दूसरे से मिलकर सुलझानी चाहिए। क्योंकि हर समस्या का हल है।

हर्षवर्धन शर्मा (मार्मिक धारा)

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