पाठकों आज हम शिक्षा के महत्व पर एक पुरातन कहानी का वर्णन कर रहे हैं।
एक बार एक राजा उज्जैन नगरी में राज करता था। भगवान शंकर की इस नगरी में ब्रिजा प्रिय राजा का राज्य बहुत खुशहाली से चल रहा था। राजा न्याय प्रिय था। राजा का एक राजकुमार जिसका नाम यशवर्धन था। राजा अपनी राजकुमार की शिक्षा को लेकर बहुत अधिक चिंतित था। वह उसे भविष्य में श्रेष्ठ राजा के रुप में देखना चाहता था।इसलिए उसने अपनी राज्य में ऐलान किया जो गुरु मेरे बेटे को संपूर्ण शिक्षा देगा मैं उसको अधिकतम धन दूंगा।
कई शिक्षाविद विद्वान यह समझ ही नहीं पाए कि संपूर्ण शिक्षा कैसे देनी है? राजा की दर से यदि संपूर्ण शिक्षा नहीं दे पाए तो राजा नाराज हो जाएंगे और दंड देंगे।
एक दिन एक विख्यात गुरुदेव जिनका नाम दूर-दूर तक था। दरबार में आकर राजा से बोले
(राजा का दरबार लगा हुआ है सेनानायक दरबार में आया)
सेनानायक— महाराज की जय
राजा—क्या हुआ?
सेनानायक—महाराज जी एक गुरुदेव पधारे हैं तथा वह आपसे मिलना चाहते हैं।
राजा— आदर के साथ उन्हें अंदर लेकर आओ।
सेनानायक—जो आज्ञा महाराज (सेनानायक गुरुदेव को लेने जाता है तभी गुरुदेव सेनानायक के साथ अंदर आते हैं।)
राजा —गुरुदेव को प्रणाम
गुरुदेव—प्रणाम!महाराज मैंने सुना था कि आप को अपने राजकुमार को संपूर्ण शिक्षा के लिए एक शिक्षक की आवश्यकता हैं ।
महाराज—हां गुरुदेव आपने सही सुना है।हमें ऐसे गुरु की आवश्यकता है जो मेरे पुत्र को संपूर्ण शिक्षा प्रदान कर सकें।
गुरुदेव—आपको गुरु दक्षिणा शुरुआत में देनी पड़ेगी यह मेरी शर्त है।क्योंकि मुझे इसकी अभी आवश्यकता है यदि आप मेरी इस शर्त को मान सके तो अपने पुत्र को मेरे साथ आश्रम में भेज दीजिए।
महाराज—आपने तो मुझे डरा दिया। मैंने सोचा था कि बहुत बड़ी शर्त होगी। लेकिन यह तो तुच्छ शर्त है।जैसी आज्ञा गुरुदेव लेकिन मेरी भी शर्त होगी कि मेरे पुत्र को आप संसार का संपूर्ण ज्ञान प्रदान करेंगे।
गुरुदेव—मुझे आपकी शर्त मंजूर है।
(इस प्रकार राजा ने अपने वादानुसार गुरुदेव को अपनी इच्छा से भी अधिक धन प्रदान किया अर्थात अत्यधिक धन दिया। गुरुदेव राजा के पुत्र यशवर्धन को अपने साथ लेकर अपने आश्रम चले गए।)
18 वर्ष पूर्ण होने के बाद गुरुदेव ने उससे कहा
गुरुदेव— तुम्हारी लगभग शिक्षा पूर्ण हो चुकी है। अब थोड़ी बहुत शिक्षा तुम्हारी रह गई है। इसलिए एक माह बाद तुम्हारे पिता तुम्हें लेने आएंगे। इसकी जानकारी मैं राजा को भेज देता हूं।
यशवर्धन—जैसी आज्ञा गुरुदेव!
ऐसी जानकारी भेजने के बाद गुरुदेव में 15 दिन राजकुमार से धूप में कार्य करवाया। खाने को रुखा सुखा दिया। एक या 2 दिन छोड़कर राजकुमार को खाना दिया गया। गलती करने पर राजकुमार को दंड स्वरूप कोड़े दिए गए। 10 कोड़े के बाद राजकुमार बेहोश हो गया।
इस प्रकार जिस दिन महाराज को आना था ।उस दिन से 5 दिन पहले राजकुमार में 10 कोड़े मारे तथा कई दिनों तक भूखा रखा और गुरुदेव वहां से भाग गए। महाराज ने राजकुमार को लाने अपनी शाही सेना को भेजा। सेनापति ने आश्रम में देखा तो वहां कोई नहीं था। उसने इसकी सूचना महाराज को पहुंचाई। महाराज स्वयं उस आश्रम में आए।
सेनापति—महाराज! मैंने आपको सूचना पहुंचाई थी कि गुरुदेव व राजकुमार का कोई अता पता नहीं है। मैंने आसपास जानकारी की लेकिन कोई सुराग नहीं मिला।
महाराज— हे भगवान! उस पाखंडी गुरु ने मेरे बेटे के साथ ना जाने क्या किया होगा? (क्रोध में भरकर) इस पाखंडी के आश्रम को जला दो।
सैनिकों ने आश्रम को चारों ओर से घेर लिया। सैनिक जैसे ही आश्रम को जलाने लगे तभी उन्हें आश्रम के अंदर से किसी के कहारने की आवाज आई।
सैनिकों ने दरवाजा तोड़ा और देखा राजकुमार फटे पुराने कपड़ों में लेटा हुआ था तथा उसके हाथ पैर पर कोड़े के प्रहार के निशान थे।
महाराज—राजकुमार किसने किया उसका नाम बताओ?
यशवर्धन— महाराज पहले आपको वचन देना होगा कि आप उससे कुछ नहीं कहेंगे।
महाराज— अच्छा तो अब समझा तुम्हारे गुरुदेव ने ऐसा किया। सैनी को ढूंढो उसे और मृत्युदंड दे दो।
राजकुमार यशवर्धन—नहीं महाराज! ऐसा मत करना मैं स्वयं अचंभित हूं। कि गुरुदेव ने कभी भी मुझसे कुछ नहीं कहा तथा गुरु माता भी मुझसे बहुत अधिक स्नेह रखती थी। इतने वर्षों से इन दोनों ने मेरा विशेष ध्यान रखा है लेकिन आखरी माह में उनका व्यवहार बदल गया। इस बात का मुझे भी आश्चर्य है।
राजा ने गुरुदेव को खूब ढूंढा लेकिन गुरुदेव ने नहीं मिले। कुछ वर्षों बाद जब राज्य सिंहासन की बागडोर राजकुमार के पास आई अर्थात राजकुमार जी महाराज बने।महाराज बनने के कुछ महीने बाद ही उनकी न्यायप्रियता का डंका चारों ओर फैल गया। उनके कार्यों की प्रशंसा चारों ओर होने लगी।
राजकुमार अपने दरबार में बैठा था तभी एक सेनानायक आया और बोला
सेनानायक— महाराज की जय हो।
राजा — क्या हुआ?
सेनानायक—महाराज! एक महात्मा जी आपसे मिलना चाहते हैं।
राजा— आदर के साथ उनको लेकर आओ।
(सेनानायक जैसे ही उन महात्मा को अंदर लेकर आया। राजा ने उस महात्मा को देखा और अपने आसन से खड़े हो गए। राजा अपने आसन से उतरकर महात्मा के पास आए और उनके पैर छुए और राजा ने महात्मा जी से कहा)
राजा—प्रणाम गुरुदेव!
गुरुदेव—आयुष्मान यशवर्धन!
राजा—गुरुदेव इतने दिनों से आप कहां थे? तथा प्रभु!मेरे समझ में आज तक यह नहीं आया कि आखरी माह में आपका व्यवहार इतना विचित्र क्यों हो गया? कृपया गुरुदेव इसका जवाब जरूर दीजिए।
गुरुदेव—-महाराज आप मेरे आश्रम में कई वर्षों तक रहे। मैंने सभी शिष्यों की तरह आपको भी वही स्नेह दिया। जो अन्य शिष्यों से मेरा व्यवहार था। लेकिन राजन! आखरी माह से पहले मैंने तुमसे कहा था कि तुम्हारी शिक्षा पूर्ण हो गई है और 1 माह बाद तुम्हारे पिताजी तुम्हें लेने आएंगे।
राजा—-शत प्रतिशत सत्य आपने ऐसा कहा था।
गुरुदेव—- राजन! आपके पिता ने मुझसे संपूर्ण शिक्षा देने का वचन लिया था। आज राजन! आपकी कार्यों तथा न्यायप्रियता की जो प्रशंसा होती है। उसका कारण आपकी आपकी माह की शिक्षा है। राजन! मैंने आपको भूखा रखा तो आपको भूख का महत्व समझ में आ गया। आप कभी भी अपने राज्य में किसी को भूखा नहीं रहने देंगे। क्योंकि भूख की पीड़ा आप जानते हैं। धूप में कड़ी मेहनत करने से आपको मेहनत का महत्व समझ में आया। आप अपनी प्रजा पर अनावश्यक कर का भार नहीं लगाएंगे। क्योंकि कड़ी धूप में कार्य करने का महत्व आप समझ गए हैं इसलिए आपकी किसान व व्यापारी आप से खुश हैं। तीसरा आपको कोड़े लगाए तो जब भी आप किसी को दंड देंगे। तो आपको कोड़े की पीड़ा का ज्ञान रहेगा। जिसे आप किसी को दंड देंगे तो प्रत्येक कोड़े का एहसास आपको भी रहेगा। जिससे आप दंडानुसार ही दंड देंगे तथा आप क्रूर नहीं होंगे। राजन आपकी न्यायप्रियता में आखिरी माह की शिक्षा का महत्व है।
(राजा ने गुरुदेव के पैर पकड़ लिए और राजा ने कहा)
राजा— गुरुदेव आप धन्य हैं। सत्य कहा है गुरु के ज्ञान के बिना जीवन निरर्थक है।
इस प्रकार इस कहानी में बताया गया है कि जब तक आप पीड़ा को स्वयं नहीं सहेंगे। तब तक आप को पीड़ा का एहसास नहीं होगा।
हर्षवर्धन शर्मा (मार्मिक धारा)