दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की जयपुर के विपश्यना ध्यान केंद्र में मौन साधना शुरू हो चुकी है। मुख्यमंत्री केजरीवाल रविवार को जयपुर पहुंचे थे। बुधवार को ध्यान साधना का तीसरा दिन रहा। केजरीवाल वीवीआइपी सुविधाओं से दूर सिर्फ साधक की तरह रह रहे हैं।
जयपुर शहर से करीब 10 किलोमीटर दूर आगरा रोड पर गलता तीर्थ की तरफ जाने वाले रास्ते पर पहाड़ी की तलहटी में घने जंगलों के बीच विपश्यना ध्यान केंद्र है। यहां आम लोगों का प्रवेश निषेध है। सिर्फ साधक और साधना केंद्र से जुड़े सेवक ही विपश्यना केंद्र में जा सकते हैं।
एक मीडिया से बातचीत में साधक कमल ने बताया कि 10 दिन की साधना में साधकों का बोलना भी मना होता है। यहां केजरीवाल वीवीआईपी सुविधाओं से दूर रहकर ध्यान केंद्र के नियमों के अनुसार सामान्य साधकों के जैसे ही विपश्यना केंद्र में साधना कर रहे हैं। यहां वे विपश्यना साधना के अलग-अलग सेशन अटेंड करेंगे। वह आम आदमी पार्टी के पदाधिकारियों के साथ मीटिंग नहीं करेंगे। साथ ही किसी राजनीतिक कार्यक्रम में भी हिस्सा नहीं लेंगे।
10 दिन तक सुबह 4 बजे उठने से शुरू होती है दिनचर्या-
साधक नीलमचंद मुणोत ने बताया कि विपश्यना के नियमों के अनुकूल उन्हें सुबह 4 बजे से सुबह 6 बजे तक साधना कक्ष में जाना होगा। वहां साधना के बाद एक से डेढ़ घंटे के दौरान अल्पाहार, स्नान आदि कार्य संपन्न करने होंगे। फिर साधना कक्ष में नियमित ध्यान पर खुद को केंद्रित करना होगा।
यहां 10 से 11 दिन की साधना के दौरान मौन व्रत का पालन करना होता है। एक कमरे में एक व्यक्ति को रहना होता है। यानी अकेला जीवन, खुद के लिए जीवन जीना होता है। एक समय का ही भोजन करना होता है। परंपरागत जीवन से खुद को अलग करना होता है। केजरीवाल भी इस तरह की तपस्या से गुजर रहे हैं।
दोपहर भोजन के लिए भी एक से डेढ़ घंटे का समय दिया जाता है। कुछ देर आराम के लिए भी समय मिलेगा। रात्रि में एक वीडियो सुनाया जाएगा। वीडियो में विपश्यना मिलने वाली जीवन जीने की कला को सरल भाषा में समझाया जाता है। रात्रि 9 बजे विश्राम का समय निर्धारित है। इन 10 से 11 दिन के दौरान केजरीवाल का प्रत्येक कार्य उन्हें खुद करना होगा। उन्हें कोई सहयोगी नहीं मिलेगा। अल्पाहार और भोजन भी एकदम सामान्य होगा।
आइए जाने क्या है विपश्यना साधना-
विपश्यना की ध्यान विधि एक ऐसा सरल और कारगर उपाय है जिससे मन को वास्तविक शांति प्राप्त होती है। एवं सुखी उपयोगी जीवन बिताना संभव हो जाता है। विपश्यना का अभिप्राय है जो वस्तु सचमुच जैसी हो, उसे उसी प्रकार जान लेना। आत्मनिरीक्षण द्वारा मन को निर्मल करते करते ऐसा होने ही लगता है। हम अपने अनुभव से जानते हैं कि हमारा मानस कभी विचलित हो जाता है, कभी हताश, कभी असंतुलित।
इस कारण जब हम व्यथित हो उठते हैं। तब अपनी व्यथा अपने तक ही सीमित नहीं रखते, दूसरों से बांटने लगते हैं। विपश्यना हमें इस योग्य बनाती है कि हम अपने भीतर शांति, सामंजस्य का अनुभव कर सकें। यह चित को निर्मल बनाती है। यह चित की व्याकुलता और इसके कारणों को दूर करती है। यदि कोई इसका अभ्यास करता रहे तो, कदम कदम आगे बढ़ता हुआ अपने मानस को विकारों से पूरी तरह मुक्त करके नितांत, विमुक्त अवस्था का साक्षात्कार कर सकता है।
अजय सिंह भाटी (मार्मिक धारा)