पाठकों,”जीवन जीने की कला” नामक शीर्षक के अंतर्गत एक सच्ची कहानी लिख रहा हूं। आजकल चारों तरफ हम नारी शक्ति के बारे में सुनते हैं। लेकिन 90% लोग इस तथ्य को समझते ही नहीं है। आज हम इस सत्य घटना के माध्यम से नारी शक्ति को समझाने की कोशिश कर रहे हैं। कैसे एक स्त्री सारे जीवन संघर्ष करने के बाद स्वयं तथा अपने परिवार को सफल बनाती है?
यह घटना एक सत्य घटना है। केवल इसमें नाम परिवर्तन किया गया है तथा कुछ स्थानों का परिवर्तन किया गया है। इस कहानी में एक नारी की सहनशीलता , हिम्मत, कर्म क्षमता तथा जीवन के प्रति संघर्ष को बड़े सहज भाव से सहन करने की क्षमता को भी बताया गया। जीवन के तमाम संघर्ष के बाद आखिर में सफलता को प्राप्त करना ऐसा कहानी में बताया गया है।
इस सत्य घटना के द्वारा हमें शिक्षा मिलती है कि जीवन में कितने भी बड़ी से बड़ी समस्याएं आएं। लेकिन व्यक्ति को हिम्मत नहीं हारनी चाहिए। मनुष्य अपनी हिम्मत से बड़ी से बड़ी चीजों को प्राप्त कर सकता है। कभी भी जीवन में हिम्मत मत हारिए अपने आप को सकारात्मक बनाए रखिए।
चलिए पाठकों, अब कहानी पर आते हैं। मित्रों, यह कहानी हमारी कॉलोनी में रहने वाली तथा हमें पढ़ाने वाली एक शिक्षिका की है। जिसका नाम कविता चतुर्वेदी है।
(मैं एक मीटिंग में था। मीटिंग 11:00 बजे शुरू हुई तथा 11:45 तक चली। मैं मीटिंग हॉल से बाहर आया। मेरे मैनेजर अजय सिंह (अजय सिंह मेरी कंपनी में मैनेजर एवं P.A. दोनों हैं।) अजय ने मुझसे कहा।
अजय सिंह—-सर आपकी मम्मी जी का फोन आया था।
हर्षवर्धन—-क्या बात हो गई?
अजय सिंह–नहीं सर ऐसी इमरजेंसी नहीं है। उन्होंने कहा था जब हर्ष फ्री हो जाए तो मुझसे बात कर ले। शायद कोई काम होगा।
(अजय से मैंने अपना मोबाइल लिया और मैंने अपनी मां को फोन किया।)
मम्मी जी–हेलो
हर्षवर्धन—हेलो, नमस्ते! कैसे फोन किया?
मम्मी जी–नमस्ते! कभी हमें भी याद कर लिया कर।
हर्षवर्धन—परसों बात हुई थी। कल समय नहीं मिल पाया। आपको ही याद करते रहते हैं।
मम्मी जी—बेटा एक काम था।
हर्षवर्धन—हां !आदेश करो। अगर इतनी इमरजेंसी थी तो आप अजय को बोल देते वह मीटिंग में मुझे फोन दे देता।
मम्मी जी–नहीं ऐसी इमरजेंसी नहीं है। सुनो! हमारे घर के पास जो चतुर्वेदी मैडम रहती थी।
हर्षवर्धन—हां! चतुर्वेदी मैडम रहती थी। उन्होंने हमें पढ़ाया भी था। मैं अच्छी तरीके से उन्हें जानता हूं।
मम्मी जी–हां! उनके दो बेटी हैं। एक बेटी सरकारी इंजीनियर है और दूसरी बेटी सरकारी अध्यापिका है। दोनों बेटी 2 साल के अंतराल में ही नौकरी में लग चुकी है।
हर्षवर्धन—हम जब पढ़ते थे। जब तक उनके कोई संतान नहीं थी।
मम्मी जी—हां, अब सुनो, मैडम फोन करेंगी। उनकी छोटी बेटी की पोस्टिंग जयपुर हुई है। इसलिए उन्होंने तुम्हारा पता तथा फोन नंबर लिया है। उनकी जो सहायता हो सके वह कर देना। यदि तुम्हें समय नहीं मिले। तो किसी को साथ भेज देना। बेचारी ने पूरी जिंदगी बड़ा कष्ट पाया है। अब जाकर जीवन में कुछ खुशी के क्षण आये हैं।
हर्षवर्धन—आप चिंता मत करो। आप उनसे कह देना कि या तो मुझे उनका मोबाइल नंबर दे दो। या वह मुझसे बात कर ले लेकिन आप बिल्कुल चिंता मत करो।
मम्मी जी—ठीक है।
(इस प्रकार उन्होंने फोन रख दिया। फिर मैं कविता मैडम के जीवन की संघर्षपूर्ण कहानी थी उसमें मैं खो गया। यह कहानी जबकि है जब मैं कक्षा 8 में पढ़ता था। फरवरी में कविता मैडम की शादी हुई थी।उनके माता-पिता का पहले ही स्वर्गवास हो चुका था। केवल भैया भाभी थे। मैडम को इतना अच्छा स्वभाव था कि उनकी भाभी उनको अपनी बेटी से भी ज्यादा चाहती थी तथा हमेशा उनकी प्रशंसा करती थी। उन्होंने अपनी हैसियत से भी अधिक अच्छी शादी की। भैया यानी कविता मैडम के पति जिनका नाम सुशील था। (मित्रों केवल पात्रों के नाम बदले गए हैं लेकिन घटना सत्यता पर आधारित है।) सुशील जी के पिता कॉपरेटिव डिपार्टमेंट से रिटायर व्यक्ति थे। उनका नाम श्याम सुंदर था। उनके कुल तीन बेटे थे। दूसरे नंबर के बेटे का नाम वीरेंद्र था तथा सबसे छोटे बेटे का नाम जितेंद्र था। दूसरे नंबर का बेटा सबसे अधिक चालाक था। तीसरे नंबर का बेटा 11वीं क्लास में पढ़ रहा था। कविता मैडम के पति वह बिरला की कंपनी सिमको में कार्य करते थे। 6 महीने बाद ही श्याम सुंदर जी के दूसरे पुत्र वीरेंद्र की भी शादी हुई। उसकी पत्नी का नाम अनीता था। शादी के कुछ ही दिनों बाद उसने अपने माता पिता को अपने बड़े भाई भाभी के खिलाफ कान भरना शुरू कर दिया। जिससे माता-पिता भी सुशील और कविता के खिलाफ हो गए। उन्होंने उन्हें घर से निकाल दिया। वह कुछ ही दूरी पर हमारे घर के पास रहने लगे। माता पिता का स्वभाव भी बेहद तेज था। वह कविता को हमेशा अनाथ होने का ताना देते रहते थे। कविता ने पूरी कोशिश की कि वह अपने सास-ससुर को मना ले लेकिन वह सफल नहीं हो सकी। वीरेंद्र उन्हें सफल नहीं होने दे रहा था। जिसके कारण उन्हें घर से निकलना पड़ा।
नए घर में रहते हुए अभी एक ही महीने हुआ था। एक दिन ऑफिस से उदास सुशील ने घर के अंदर प्रवेश किया। दरवाजा खटखटाया। कविता ने दरवाजा खोलो।
कविता—आज आप 1 घंटे जल्दी कैसे आ गए? बड़े उदास दिख रहे हो। क्या तबीयत खराब है?
(सोफे पर बैठे हुए सुशील ने कहा)
सुशील—कविता पानी लाना।
कविता— अभी लाती हूं।(कविता पानी लेने जाती है तथा पानी एक गिलास भरकर सुशील को पीने के लिए देती है। सुशील पानी पी लेता है। कविता सुशील से पूछती है।)
कविता—क्या हुआ?
सुशील—कुछ नहीं।
कविता—सच बताओ आज आप बहुत अधिक उदास दिख रहे हो।
सुशील—(आंखों में आंसुओं के साथ) कविता हमारी कंपनी बंद हो रही है।अगले 1 तारीख से शायद हमें कंपनी से निकाल दिया जाएगा।
(कविता ने सुना तो उसका दिमाग घूम गया। लेकिन उसने बचपन से ही संघर्ष देखे थे। इसलिए उसने अपने दुख को जाहिर नहीं किया। उसने कहा)
कविता—कोई बात नहीं। नौकरी तो दूसरी मिल जाएगी। मैं भी आज आपसे कहना चाहती थी कि मेरा घर में मन नहीं लगता है। मैं स्कूल जॉइन करना चाहती हूं। मैं तो आपसे आज यही पूछना चाहती थी। आप बिल्कुल चिंता मत करना।
सुशील—जैसा तुम्हें अच्छा लगे। लेकिन आज मेरा बोलने का मन नहीं कर रहा है। (वह अपनी आंखें बंद कर सोफे पर लेट जाता है)
कविता—कोई चिंता मत करो। आप लेट जाओ।
(रसोई में जाकर कविता बुरी तरह रोने लगी। लेकिन रोने की आवाज उसने अपने पति तक नहीं पहुंचने दी। उसके सास ससुर अक्सर उसे मनहूस कहते थे। उसे अपने भाग्य पर दुख होने लगा। तभी उसने अपने मन ही मन सोचा कि वह कल से स्कूल जॉइन करेगी। दूसरे दिन अखबार में विज्ञापन देखकर वह कई स्कूलों में इंटरव्यू देने गई। आखिर में एक स्कूल जोकि कविता के घर के पास ही था तथा मैं भी उसी स्कूल में पढ़ता था। उन्होंने मुझे देखा।)
कविता मैडम—हर्ष तू यहां पढता है।
हर्षवर्धन—हां मैडम (मैंने अपने मम्मी पापा को बताया तो हमें हमारे मम्मी पापा ने उनके पास ट्यूशन को भेज दिया। एक दिन उन्होंने मुझसे कहा।)
कविता मैडम–बेटा हर्ष और भी कोई बच्चे हो तो उनको भी बुला लाना। तुम्हारे साथ ही पढ़ लेंगे।
हर्षवर्धन—ठीक है मैडम!
(हमने ट्यूशन में बच्चे बढ़ाने की पूरी कोशिश की और हम सफल भी हुए दूसरी तरफ सुशील जी का जॉब छूट गया। उन्होंने दूसरी जगह भी कोशिश की लेकिन वह एक 2 साल से ज्यादा नौकरी नहीं कर सके। फिर वह डिप्रेशन में आ गये। कविता मैडम ने घर में ही उनको दुकान खुलवा दी। मैडम ने पूरी कोशिश की कि वह डिप्रेशन से बाहर आ जाएं। लेकिन दिन प्रतिदिन डिप्रेशन के कारण उनका शरीर गिरता चला गया । कविता मैडम उनको खूब समझाती कि एक दिन सब कुछ ठीक हो जाएगा। लेकिन उनका मन मानने को तैयार नहीं था। सुशील जी जिनकी उम्र 38 साल हो चुकी थी। एक दिन अचानक हार्ट अटैक आया और उनके जीवन की घड़ी समाप्त हो गई। उस समय मैडम स्कूल में थी। उसी समय में अपनी मम्मी के साथ वहां गया।)
(सुशील जी के घर का दृश्य)
(मैडम मेरी मम्मी के गले लगकर रोने लगी। उन्होंने कहा)
कविता—दीदी मैंने पूरी कोशिश की कि उनको डिप्रेशन से बाहर ला सकूं लेकिन मैं हार गई। मैं एक पल इनके बिना नहीं रह सकती हूं। इनके बिना मेरे जीवन की कल्पना करना बड़ा मुश्किल है। मेरे सास-ससुर सही कहते हैं। कि मैं मनहूस हूं। मैं अपना जीवन समाप्त कर लूंगी।
मम्मी जी—ऐसे नहीं बोलते हैं। यह तो होनी है। इसे भला कौन टाल सकता है। तुम तो बहुत हिम्मत वाली हो। तुम्हें अपनी बेटियों का ध्यान रखना है। यह बच्चे ही तुम्हारे जीने का सहारा है। ये यह बच्चे तुम्हारा जीवन जीने का उद्देश्य हैं। तुम्हें हिम्मत रखनी चाहिए।
(सुशील के मरने के बाद भी उनके माता-पिता यानी कविता के सास ससुर ने बिल्कुल भी दया नहीं दिखाई। कविता ने ठान लिया कि वह अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देगी। उन्होंने साथ-साथ अपनी पढ़ाई भी करना शुरू कर दिया। 1 साल बाद ही उनका चयन केंद्रीय विद्यालय में तृतीय श्रेणी अध्यापक के रूप में मध्यप्रदेश में चयन हो गया। अब उनके सामने बच्चों की प्रॉब्लम आई। क्योंकि तब भी सास-ससुर ने बच्चों तक को रखने से मना कर दिया। एक बच्ची 12वीं क्लास में थी। एक नवी कक्षा में थी। फिर कविता की भाभी ने अपने शहर से एक वृद्ध महिला को बच्चों के साथ रख दिया। कुछ महीने बाद भाभी की भी मृत्यु हो गई। भैया का स्वर्गवास पहले ही हो चुका था। प्राइवेट स्कूल में पढ़ाते हुए घर में कोचिंग करते हुए साथ-साथ उन्होंने प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी की। मध्यप्रदेश में नौकरी करते हुए 1 साल हुआ था। कि उनका चयन राजस्थान में स्कूल व्याख्याता में हो गया। स्कूल व्याख्याता की परीक्षा पहले हो गई थी रिजल्ट उसका देर में आया था।
इस प्रकार पूरे जीवन संघर्ष करने के बाद उन्होंने सफलता प्राप्त की दूसरे दिन वह मेरे ऑफिस में आयी। उन्होंने चपरासी से कहा मैंने उन्हें तुरंत अंदर आने को कहा। जैसे ही मैडम ने मेरे ऑफिस में प्रवेश किया।
हर्षवर्धन—आइए मैडम ( अपनी कुर्सी से उठकर मैंने मैडम के पैर छुए)
कविता मैडम–खुश रहे हर्ष! और क्या हालचाल है तेरे?
हर्षवर्धन—ठीक हूं मैडम।
(मैंने चपरासी से चाय के लिए बोला। तभी मेरी पत्नी ने भी ऑफिस में प्रवेश किया। क्योंकि मेरा एक स्कूल है और वह भी उसी स्कूल को संभालती है। उसने भी मैडम के पैर छुए तथा वह भी ऑफिस में बैठ गयी। मैडम की दोनों बेटी जिनका नाम सोनू और मोनू था। उन्होंने भी ऑफिस में प्रवेश किया।
सोनू व मोनू —भैया नमस्ते!
हर्षवर्धन—नमस्ते! बैठो। आप दोनों अपनी मम्मी का विशेष ध्यान रखना। जिन्होंने जीवन भर संघर्ष कर तुम दोनों को इतना योग्य बनाया है।
अंजली (मेरी पत्नी)–आप सही कह रहे हो। मैडम यह आपकी बड़ी तारीफ करते हैं तथा आपकी हिम्मत और मेहनत की हमेशा प्रशंसा करते हैं। वास्तव में मैडम आपने बहुत संघर्ष किया।
कविता मैडम—बेटा आप दोनों से मैं यह कहना चाहती हूं। कि अपना जीवन बड़ी खुशी खुशी से निकालना। एक दूसरे की गलतियों को माफ कर देना। क्योंकि जब जीवन में किसी चीज की कमी होती है तो उसका वास्तविक महत्व समझ में आता है। याद रखना आर्थिक दुख दुनिया का सबसे छोटा दुख है। और मेरा कहना है यह कोई दुख ही नहीं है। क्योंकि हर व्यक्ति अपनी हैसियत के हिसाब से अपने जीवन को ढाल लेता है। लेकिन कुछ दुख ऐसे होते हैं। जिन की पूर्ति कभी नहीं होती है। मैंने अपने माता-पिता को बचपन में खो दिया तो मैंने सोचा था की सास ससुर से वह माता-पिता का प्रेम प्राप्त हो जाएगा। लेकिन वह भी प्राप्त नहीं हुआ। मेरे पति जिनके सिवा मेरा कोई नहीं था। उनको भी मैंने खो दिया। आज वह जीवित होते तो कितने खुश होते । मैं जब पति पत्नी को लड़ते झगड़ते, तलाक लेते देखती हूं। तो सोचती हूं। यह कितने मूर्ख हैं? यह नहीं जानते हैं। यदि इनमें से एक की भी कमी होती है। तो इनका जीवन व्यर्थ हो जाएगा। बेटा मनुष्य तो गलतियों का पुतला है। इसलिए एक दूसरे को माफ कर देना चाहिए। और जीवन में सहनशीलता एवं धैर्य से हर रिश्ते को बचाने की कोशिश करनी चाहिए।जीवन में अत्यधिक मेहनत करनी चाहिए।
हर्षवर्धन शर्मा (मार्मिक धारा)