पाठकों ” जीवन जीने की कला” नामक शीर्षक के अंतर्गत एक नई कहानी लिख रहा हूं। यह कहानी तलाकशुदा दंपतियों पर आधारित हैं। आजकल पति और पत्नी में तलाक होना सामान्य बात हो गई है। आज से 20 साल पहले तलाकशुदा दंपत्ति बड़ी मुश्किल से मिलती थी। लेकिन आज के दौर में यह एक सामान्य बात है। विदेशों में तलाक लेना सामान्य बात है । लेकिन भारत में भी तलाक एक आम बात हो गई है। तलाक शब्द उर्दू शब्द है। सनातन धर्म या हिंदू धर्म में विवाह शब्द है। लेकिन तलाक नाम का कोई शब्द नहीं है। अर्थात सनातन धर्म में माना जाता है कि यदि एक बार पति पत्नी बन जाने के बाद सात जन्मो तक वही पति पत्नी ही रहेंगे। इसलिए हिंदू धर्म में तलाक नामक कोई शब्द नहीं है। वर्तमान स्वरूप में परित्यक्ता शब्द आया है।जो शब्द नहीं होते हैं उनको संधि से बनाया जाता है। परित्यक्ता शब्द का सामान्य अर्थ तो “छोड़ना” होता है। वह वस्तु व्यक्ति कुछ भी हो सकता है। लेकिन पति-पत्नी के संदर्भ में कोई उचित शब्द नहीं है। यह सभी वस्तुओं को छोड़ने के संदर्भ में भी आता है। इस कहानी से दांपत्य जीवन की सबसे बड़ी समस्या पर प्रकाश डालने की कोशिश की गई है। यदि इस समस्या को आप महसूस कर सके तो शायद यह कहानी हमारी सफल हो जाएगी।
कुछ नजर आंकड़ों पर डालते हुए कहानी शुरू करता हूं। भारत में 13 लाख 6 हजार दंपत्तिया तलाकशुदा है। जो कुल विवाहित जोड़े का 0.24% है। तथा संपूर्ण आबादी का 0.11% है। मिजोरम सबसे अधिक तलाकशुदा दम्पत्तियों का शहर है।(4.08%), दूसरा राज्य नागालैंड जहां अनुपात 0.88% है। आसाम, महाराष्ट्र, वेस्ट बंगाल और जम्मू एंड कश्मीर हैं। जहां तलाक का अनुपात अन्य राज्यों से अधिक है।
मित्रों केवल सनातन धर्म में पति पत्नी के रिश्ते को मजबूत बनाने के लिए "करवा चौथ" त्यौहार मनाया जाता है। अन्य किसी धर्म, समुदाय या पंथ में पति पत्नी से संबंधित कोई त्यौहार नहीं है। विश्व में सनातन धर्म ही है जिसमें सभी समस्याओं का हल है। इसलिए "तलाक"शब्द सनातन धर्म में नहीं है।
पाठकों अब कहानी शुरू करते हैं। मित्रों मेरा एक दोस्त जिसका नाम गोपाल है। गोपाल के माता-पिता दोनों शिक्षक हैं। गोपाल भी 12वीं कक्षा को पढ़ाने वाला प्राध्यापक है। वह अपने माता-पिता का इकलौता बेटा है। उसकी नौकरी को 3 वर्ष हुए हैं। उसकी शादी के लिए अच्छे से अच्छे रिश्ते आ रहे हैं। गोपाल के पिता जी का नाम रमन शर्मा है और माता का नाम मधुमति है।
रमन जी और मधुमति जी दोनों सेवानिवृत्त हो चुके हैं। शाम के 5:00 बज चुके हैं। रमन जी अखबार पढ़ रहे हैं। मधुमति जी यानी गोपाल की मां रसोई में कार्य कर रहे हैं। गोपाल विद्यालय से पढ़ाकर घर में प्रवेश करता है। सोफ़ा पर बैठता है और कहता है।)
गोपाल—मम्मी जी! चाय बना दो बहुत थक गया हूं।
गोपाल की मां—(पानी लाते हुए) आ गया बेटा, ले पानी पी, अभी चाय लेकर आती हूं।
गोपाल के पिताजी—मेरी भी चाय बना लेना।
गोपाल की मां—आपको कहने की जरूरत ही नहीं है। जब भी चाय बनती है। आपको तो बिना कहीं चाय बन जाती है।
(थोड़ी देर में चाय बन कर आती है साथ में गोपाल की मां बिस्कुट का नमकीन भी लाती है। गोपाल चाय के साथ नमकीन बिस्कुट खाता है। थोड़ी देर बाद गोपाल के पिताजी गोपाल से कहते हैं।)
गोपाल के पिताजी—बेटा आज एक बहुत बढ़िया रिश्ता आया है। लड़की इकलौती लड़की है। लड़की का एक भाई है जोकि बहुत अच्छी नौकरी करता है। लड़की के पिताजी राजस्थान प्रशासनिक सेवा (RAS) में हैं। बेटा! बहुत अच्छा परिवार है। यह परिवार मिश्रा जी का जानकार है। इस परिवार की मिश्रा जी बड़ी प्रशंसा कर रहे थे। अगले रविवार को लड़की देखने चलना है। ठीक है ना बेटा।
गोपाल—जैसा आपको ठीक लगे।
(रविवार को लड़की देखने के बाद गोपाल को भी लड़की पसंद आ जाती है और अच्छे मुहूर्त दोनों की शादी हो जाती है। लड़की का नाम रंजना है। जोकि एक पढ़ी-लिखी आधुनिक लड़की है। शादी के 1 महीने बाद)
गोपाल— रंजना थोड़ा बहुत घर का काम कर लिया करो। मैं देखता हूं। सारे दिन मां ही सारा काम करती है। उनकी भी उम्र हो गई है।
रंजना— गोपाल आपको मालूम है कि मेरे घर में 5 नौकर हैं और तुम्हारे घर में नौकरानी तक भी नहीं है। पूरे घर का काम मुझसे नहीं हो सकता।
गोपाल—यह तुम क्या कर रही हो?और थोड़ा धीरे बोलो कहीं मां और पापा जी सुन न ले। घर का काम तो तुम ही को करना पड़ेगा। वह बुजुर्ग औरत कब तक कार्य करेगी?
(यह बात गोपाल के पिता जी सुन लेते हैं और वह नौकरानी ढूंढना शुरू कर देते हैं। दूसरे दिन नौकरानी आ जाती है।)
गोपाल— शायद मम्मी है पिताजी किसी ने सुन लिया। जब हि तो तुरंत नौकरानी आ गई।
रंजना–अच्छा हुआ सुन लिया नहीं तो तुम रोजाना मुझे ही परेशान करते हैं।
(कुछ दिनों बाद गोपाल स्कूल से आ रहा था। तभी एक सॉड ने गोपाल को टक्कर मार दी और गोपाल के हाथ व पैर में फैक्चर आ गया। फैक्चर लगवा कर अस्पताल से अपने पिताजी के साथ जैसे ही वह घर में घुसा। मां ने गोपाल को देखा)
गोपाल की मां—(रोते हुए) मेरे बेटे को क्या हो गया? पता नहीं कौन से हमारे पाप हमारे बेटे को कष्ट दे रहे हैं।
गोपाल—अरे मां! पाप आप लोगों के नहीं हैं यह तो मेरे ही हैं। डॉक्टर ने कहा है कि 2 से 3 महीने में बिल्कुल ठीक हो जाऊंगा। मां आप रो कर मुझे परेशान मत करो। पिताजी मम्मी को समझाओ।
गोपाल की पिताजी—अरे रोने से क्या होगा? 2 से 3 महीने में ठीक हो जाएगा। अब दो-तीन महीने पूरे दिन हमारे आंखों के सामने रहेगा।
गोपाल–रंजना जल्दी ही ठीक हो जाऊंगा।
(गोपाल हाथ तथा पैर में फ्रैक्चर होने के कारण वह दूसरों पर निर्भर हो गया । लंगड़ा कर चलता था बिना सहारे वह एक कदम भी नहीं चल पाता था। कुछ दिनों बाद गोपाल की मां घर का सारा काम करती थी। तथा गोपाल की पूरी देखभाल करती थी। नौकरानी केवल कपड़े व साफ-सफाई के लिए लगाई थी। सारा काम गोपाल की मां करती थी तथा गोपाल ने रंजना से कहा)
गोपाल— रंजना मैं देखता हूं कि तुम सारे दिन कुछ नहीं करते हो मैं कोई काम की कहूं तो तुम दूसरे कमरे में बैठ जाती हो।
रंजना—मैं तुम्हारी नौकरानी नहीं हूं कि तुम्हारे हुकुम से सारे दिन नाचती रहूं। मैं जिस खानदान से हूं तथा जिस परिवार से हूं वहां पांच पांच नौकर हैं । मेरे पिताजी RAS है। तुम्हारे पिताजी की तरह शिक्षक नहीं है।
गोपाल—शिक्षकों से इतनी नफरत थी तो मैं भी तो एक शिक्षक हूं। खानदान नौकरों से ऊंचा नहीं होता खानदान संस्कारों से ऊंचा होता है। जैसी तुम्हारी आदत है वैसे तो नहीं लगता कि तुम ऊंचे खानदान की हो।
रंजना—(चिल्लाते हुए) मेरे खानदान के बारे में कुछ भी मत कहना। तुम्हारी जितनी तनख्वाह है उतनी हमारे नौकरों की तनख्वाह है। मेरी तो किस्मत फूट गई जो कि मैं दो कौड़ी के लोगों के घर रह रही हूं।
गोपाल–(चिल्लाते हुए) दो कौड़ी के लोगों के साथ क्यों रह रही हो?
(तभी रंजना अपना सामान संभालते हुए बोली)
रंजना—लेकिन अब मैं तुम्हारे साथ नहीं रह सकती हूं। मेरी मां सही कहती है। मैं गरीबों के घर आ गई हूं। मैं जा रही हूं।
(रंजना जैसे ही सामान लेकर घर से बाहर जाती है तभी गोपाल की मां तथा पिताजी दरवाजे पर उसे देखते हैं। गोपाल की मां रंजना का हाथ पकड़ते हुए कहती हैं।)
गोपाल की मां—बेटा गोपाल नादान है। बेटा तू तो समझदार है।
रंजना—मेरे से चिकनी चुपड़ी बातें मत करो। हम दोनों की लड़ाई की असली जड़ आप ही हैं।
(तभी गोपाल अंदर वाले कमरे से चिल्लाता है ।)
गोपाल—मां आप इसको जाने दो यह बहुत बदतमीज है। आपको मेरी कसम मां यदि इसमें आपकी और अधिक बेज्जती की तो मुझे सहन नहीं होगी।(वह रोने लग जाता है।)
(रंजना घर छोड़कर चली जाती है। रंजना की मां उसे देख कर खुश होती है। पहले हम बता चुके हैं। रंजना के भाई व भाभी भी हैं।)
(गोपाल के घर का दृश्य)
गोपाल की मां—बेटा जाकर बहू को मना ले, उसको पीहर से वापस लिया।
गोपाल—मां उसे खुद सोचना चाहिए। मेरे फैक्चर है उसे खुद ही आ जाना चाहिए।
गोपाल की मां—बेटा फोन से बात कर ले। शायद उसका गुस्सा ठंडा हो गया।
(इस प्रकार गोपाल की मां द्वारा बार-बार दबाव बनाने पर गोपाल फोन करने को राजी हो जाता है। गोपाल फोन करता है।)
गोपाल–हेलो (रंजना की मां फोन उठाती है)
रंजना की मां–हेलो, कौन बोल रहे है।
गोपाल–नमस्ते मां, मैं गोपाल बोल रहा हूं।
रंजना की मां–बोलिए
गोपाल—मम्मी जी, रंजना से बात करा दीजिए।
रंजना की मां—क्यों, कोई कसर रह गई है जो आपने फोन किया। और कोई गाली गलौज बकाया रह रही है।
गोपाल—नहीं मम्मी जी, मैं सॉरी बोलता हूं। आगे से ऐसा नहीं होगा। कृपया रंजना से बात करा दीजिए।
रंजना की मां—आगे से होने की नौबत ही नहीं आएगी। फिर कभी यहां फोन मत करना।
(ऐसा कहकर रंजना की मां ने फोन काट दिया, गोपाल को भी बहुत गुस्सा आया।)
गोपाल की मां–बेटा कोई बात बनी।
गोपाल—मैंने आपसे पहले ही कहा था। वह बहुत बदतमीज है। उसकी मां उसकी भी गुरु है।
(ऐसा कहकर गोपाल लाठी के सहारे लंगड़ा कर अपने कमरे में चला जाता है।)
(कुछ दिनों बाद गोपाल व उसके पिताजी बाहर वाले कमरे में अखबार पढ़ रहे थे तभी रंजना के पिताजी आते हैं।)
रंजना के पिताजी—गोपाल में 10 दिन के विभागीय टूर पर गया था। इसलिए तुम्हें देखने नहीं आ सका। चुनाव का मामला था इसलिए मुझे छुट्टी नहीं मिली। बताओ कैसे हो। कुछ आराम है।
गोपाल—नमस्ते, आपको देख कर बड़ी खुशी हुई। अब थोड़ा आराम है। अंकल रंजना कैसी है? सॉरी अंकल मुझसे गलती हो गई।
रंजना के पिताजी—सॉरी किस बात की बेटा?बेटा जी दुनिया में सबसे अधिक पति पत्नी ही लड़ते हैं। यह कोई नई बात नहीं है। बेटा आपका पेर ठीक हो जाए तो फिर आप घर आना तभी रंजना भी आ जाएगी। चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है।
(2 महीने बाद गोपाल बिल्कुल सही हो जाता है तभी गोपाल की मां गोपाल से कहती है।)
गोपाल की मां—बेटा अब तो बहू को ले आओ।
गोपाल–मां कैसी बातें कर रही हो? जो पत्नी अपने पति के दुख में साथ नहीं निभा सकते वह जीवन भर साथ कैसे निभाएगी। अगर जीवन में दोबारा कोई संकट आया तो वह फिर मुझे छोड़ देगी। इसलिए मां मैंने उससे तलाक लेने का फैसला लिया है।
(यह सुन मां रोने लगी, मां ने कई दिनों तक गोपाल को समझाया। लेकिन वह नहीं माना। उधर रंजना के पिताजी भी रंजना व उसकी मां दोनों को राजी करने की कोशिश कर चुके थे लेकिन वह भी हार गए। उन्होंने गोपाल के पिता जी से बात कर कुछ निर्णय लिया। अगले दिन)
गोपाल के पिताजी—अच्छा बेटा तुम दोनों ने तलाक लेने का फैसला ले लिया है तो मिश्रा जी के पास चले जाना उनका एक वकील जानकार है। रंजना भी वहीं आ जाएगी यदि तुम दोनों तैयार हो तो तुम दोनों के हस्ताक्षर वही हो जाएंगे। तुम 4:00 बजे चले जाना।
गोपाल— ठीक है पापा, यह समस्या जितनी जल्दी ठीक हो जाए उतना ही अच्छा है।
(मित्रों यह मिश्रा जी वहीं हैं जिन्होंने गोपाल व रंजना की शादी कराई थी। गोपाल 4:00 बजे से 20 मिनट पहले पहुंच जाता है। वहां देखता है कि रंजना भी पहले से बैठी हुई है। मिश्रा जी व उनकी पत्नी उन दोनों से बातें करना शुरू करते हैं।)
मिश्रा जी—तुम दोनों ने तलाक लेने का फैसला कर लिया है।
रंजना व गोपाल—(दोनों एक ही स्वर में) हां, अंकल
रंजना—मेरा विचार पक्का है।
गोपाल—मेरा भी विचार पक्का है।
(मिश्रा जी एक बैंक मैनेजर है तथा उनकी पत्नी एक शिक्षिका है।)
मिश्रा जी की पत्नी—आप दोनों ने विचार कर लिया है तो कोई बात नहीं। लेकिन मैं तुम दोनों से कुछ कहना चाहती हूं। मैं आशा करती हूं। तुम दोनों हमारी इतनी इज्जत तो करते हो कि हमारी बातें सुन सको।
गोपाल और रंजना—(स्वीकृति में सिर हिलाते हुए)
मिश्रा जी—बेटा आज से 25 साल पहले मेरी शादी हुई थी। शादी के कुछ साल बाद हमारे बीच तलाक हो गया। हम दोनों से एक बेटी हुई। हम दोनों शादी के 20 साल अलग-अलग रहे। मेरे मां-बाप ने मुझे बहुत समझाया। लेकिन मैं नहीं माना।
मिश्रा जी की पत्नी—इनकी गलती नहीं है। मुझे भी मेरे घर वालों ने खूब समझाया। लेकिन मैंने भी उनकी एक नहीं सुनी। हम दोनों की लड़ाई में हमारी बच्ची ने खूब दुख उठाया। उसे पिता का प्यार नहीं मिल सका।
मिश्रा जी—मैं अपनी बेटी से 20 साल दूर रहा । कभी-कभी आता था। हमें अपनी मूर्खता के कारण अपनी बच्ची व अपने माता पिता को खूब कष्ट पहुंचाया। मरते समय मेरे माता पिता को मेरी ही चिंता थी। मैं अपने माता पिता का भी दोषी हूं।
मिश्रा जी की पत्नी—मैंने भी अपने घर वालों को खूब कष्ट पहुंचाया। मैं सारी जिंदगी अपने भाई व भाभी के पास रही। सारी जिंदगी भाई भाभी के ताने सुने मेरी दो बहने जब भाई भाभी के पास आती तो उनको जो इज्जत मिलती थी वह इज्जत मुझे नहीं मिलती थी। मुझे इस बात का बहुत दुख होता था। मेरे बच्चे को भी तिरस्कार से देखा जाता था। इस सब की जड़, मैं ही थी। बेटा, किस घर में लड़ाई झगड़े नहीं होते? दुनिया में ऐसे कोई पति पत्नी नहीं है। जिन की आपस में लड़ाई नहीं होती हो। हमने अपने माता-पिता को देखा। अपने दादा दादी को देखा। समाज में सभी पति पत्नी को लड़ते देखा है।पति- पत्नी का लड़ना मूल अधिकार है क्योंकि जहां लड़ाई होती है वही प्रेम होता है वही चिंता होती है।
मिश्रा जी—बेटा आज मेरे मां-बाप, सास ससुर हमें एक साथ देखते तो कितने खुश होते हैं? हमारी बच्ची ने जो कष्ट पाया उसका कारण हम हैं।क्या हमारे जीवन के वो 20 साल वापस मिल सकते हैं? आज हमें अपनी मूर्खता पर बड़ा गुस्सा आता है। बेटा हमने जो मूर्खता की उसे भविष्य में कोई ना करें।इसलिए हम दोनों दूसरों की शादी में मध्यस्थता करते हैं तथा कोशिश करते हैं। कि हमने जो कष्ट पाया वह दूसरे ना पाए। एक बार तुम दोनों हमारी जगह रह कर सोचो। क्या हमारे वो 20 साल बापस आ सकते हैं?
(मिश्रा जी और उनकी पत्नी की बातें सुनकर दोनों जैसे शून्य से हो गए। हम दोनों की आंखों में आंसुओं की धारा बहने लगी।
रंजना—मुझे माफ कर दो। मैं भी ऐसी गलती करने जा रही थी।
गोपाल—माफी मुझे मांगने चाहिए। मुझे माफ कर दो। मैं भी भविष्य में तुम्हें कभी नाराज नहीं करूंगा तथा तलाक का विचार जीवन में कभी नहीं लाऊंगा।
(तभी दूसरे कमरे से गोपाल के पिताजी व रंजना के पिताजी हंसते हुए बाहर निकले और दोनों बोले।)
गोपाल के पिताजी—यदि हर पति पत्नी तलाक ले ले तो पृथ्वी पर एक भी दंपत्ति नहीं मिलेगी क्योंकि लड़ाई केवल पति पत्नी में ही होती है।
रंजना—अंकल आपने हमारे जीवन को बर्बाद होने से बचा लिया।
मित्रों भारतीय संस्कृति में इसलिए तलाक शब्द नहीं है। क्योंकि सनातन धर्म में करवा चौथ होता है बस बदलाव इतना करना है कि कलयुग में साल में दो बार करवा चौथ होना चाहिए।
हर्षवर्धन शर्मा (मार्मिक धारा)
हर्षवर्धन शर्मा (मार्मिक धारा)